फेमिनिज्म, वोकिज्म और ग्रूमिंग जिहाद: आफताब और श्रद्धा की कहानी

दिल्ली में घटे श्रद्धा हत्याकांड ने लोगों को हतप्रभ कर दिया है। लोग हैरान हैं और लोग यह प्रश्न पूछ रहे हैं कि आखिर ऐसा दरिंदा भी कोई हो सकता है? और अब जैसे खुलासे हो रहे हैं, वह दिल दहला देने के लिए पर्याप्त हैं। वह यह प्रश्न करने के लिए पर्याप्त हैं कि आखिर ऐसा क्यों कैसे कर सकता है? और इतना दरिंदा कैसे कोई हो सकता है?

और जो सबसे बड़ी बात उभर कर आ रही है, वह यह कि आफताब नामक यह आदमी हर वह रूप धरे था, जिसे हमारे यहाँ सेक्युलर माना जाता है। यह उस एजेंडे का प्रतिनिधित्व करता है, जो अंतत: हमारे ही विरोध में जाता है और वह उस कथित प्रेम का प्रतिनिधित्व करता है, जिसमें केवल और केवल हिन्दू ही खलनायक है।

आफताब का चेहरा बहुत भयानक है क्योंकि उसने प्यार, मानवता, आजादी, पर्यावरण आदि के नाम पर चल रहे उस एजेंडे का चेहरा ओढ़ रखा है, जिसका अंतिम निशाना केवल और केवल हिन्दू धर्म का विनाश है। हिन्दू धर्म का विखंडन ही जिसका उद्देश्य है। जो भी कथित पर्यावरणवादी, समानता वादी आदि आन्दोलन चलते हैं, उनका ध्येय अंत में आकर हिन्दू लडकियां और हिन्दू धर्म का विनाश ही होता है। यह बात कल्पना से परे है कि खुद को “औरतों” के अधिकारों का हिमायती बताने वाला आफताब अपने साथ के कारण घर छोड़ने वाली लड़की के साथ ऐसी दरिंदगी कर सकता है और साथ ही यह भी निकल कर आ रहा है कि जब श्रद्धा के टुकड़े उसके फ्रिज में थे, उस समय भी वह किसी और लड़की के साथ था।

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आफताब की फेसबुक प्रोफाइल उसका जो चित्रण कर रही है, वह है एक ऐसा सेक्युलर चेहरा, जिसके दिल में एलजीबीटी और महिलाओं दोनों के लिए अथाह प्यार है, आदर है।

वह सतरंगी प्रोफाइल कर लेता है और इसके साथ ही वह इतना बड़ा पर्यावरणप्रेमी है कि वह दीवाली पर पटाखे न चलाने की अपील भी करता है। उसे हर चीज की चिंता है, उसे हर समस्या की चिंता है और इसके साथ ही वह कहता है कि “अपना ईगो बर्स्ट करना चाहिए, पटाखे नहीं!”

वह ऐसे वोक जगत का चेहरा है, जहाँ पर हिन्दू विरोध फैशन है, जहाँ पर हिन्दू विरोध कूल है और जहाँ पर हिन्दू देवी देवताओं के प्रति अपशब्द कहना प्रगतिशीलता अर्थात प्रोग्रेसिवनेस की निशानी है। वह ऐसे रोमांटिक जगत का चेहरा है, जिसका लक्ष्य जड़ से कटी हुई हिन्दू लड़कियों को जाल में फांसना है। वह ऐसी रूमानी दुनिया दिखाता है, जिसमें लड़की का फंसना निश्चित है

Girls, beware of such love postings!!

Aftab Poonawala’s Facebook page (year 2010 postings) is filled with romance posts.

Wonder how girls fall for such cringe !! pic.twitter.com/4M7jHmFkFy

— Amit S.Rajawat 2.0  (@iAmitRajawat) November 14, 2022

और उसकी इस रूमानी कल्पना में लड़कियां फंस ही जाती हैं, क्योंकि जड़ों से कटी लड़कियों को प्रेम का अर्थ ही नहीं पता है। उन्हें पता ही नहीं है कि प्रेम दरअसल होता क्या है? प्रेम को देह से जोड़ने का जो पाप फेमिनिस्ट कविताओं ने और फेमिनिस्ट आन्दोलन ने किया है, वह अक्षम्य है। ऐसा करने के द्वारा हिन्दू लड़कियों को समझ नहीं आ पाता है कि दरअसल प्रेम होता क्या है?

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उनके सामने अपने परिवार और अपने धर्म की बुराई करती हुई रचनाएं होती हैं और उसके बाद उसमे तड़का लगाते हैं मुस्लिम एक्टर्स के महिमामंडन वाले लेख, वीडियो और फ़िल्में! हिन्दू लड़कियों को अपना परिवार खलनायकों से भरा हुआ लगने लगता है और मुस्लिम बादशाह आदि नायक!

सारी शायरी की दुनिया भी ऐसे ही लोगों से भरी हुई है, जो सॉफ्ट जिहाद करते रहते हैं। फ़िल्मी दुनिया के चमकते सितारे वही हैं और सीरियल्स की दुनिया में भी उन्हीं से सब कुछ रोशन है। जबकि जिन हिन्दू परिवारों का चित्रण किया जाता है, वह सभी दुःख से भरे एवं षड्यंत्रों से परिपूर्ण होते हैं। हिन्दू लड़की का मनोबल कक्षा चार या पांच से ही तोडा जाने लगता है। उसे ऐसे जाल में फंसाया जाता है, जिसमें फंसकर उसका बाहर आना असंभव है।

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हिन्दू पुरुषों को मीडिया द्वारा भगवा गुंडा, या संघी, या बजरंगी आदि कहकर एक ऐसी छवि का निर्माण किया जाता है, जिसके दिल में लड़कियों के प्रति अथाह घृणा भरी है एवं वह लड़कियों के उस प्यार के दुश्मन हैं जो प्यार और आजादी उसे आफताब जैसे लड़के दे रहे हैं।

प्रश्न यही है कि यह आजादी और परिवार से आजादी का जो जाल है, उसमें हिन्दू लडकियां कैसे फंस जाती हैं? आजादी की जो अवधारणा, स्वतंत्रता की जो अवधारणा हिन्दुओं में है, और विशेषकर हिन्दू स्त्रियों में है, वह अन्यत्र कहीं मिल नहीं सकती है फिर ऐसे में यह प्रश्न उठता ही है कि क्यों हिन्दू लड़कियों को स्वतंत्रता की हिन्दू अवधारणा शोषण का प्रतीक लगने लगती है और आजादी उन्हें ऐसा स्वप्न लगने लगती है जिसे हर मूल्य पर उन्हें पाना ही है। उन्हें आफताब जैसे वह लड़के पसंद आने लगते हैं जो लड़की की नंगी देह को आजादी बताते हुए कहते हैं कि लड़की लेबल के साथ नहीं आती

परन्तु उसकी आड़ में घृणा का वह लेबल छुपा ले जाते हैं जो उन्हें हिन्दू धर्म से है, जो उन्हें काफिरों से है!

आफताब द्वारा की गयी हत्या न ही प्रथम है और न ही अंतिम, जब तक इस समस्या को समझकर उसका निस्तारण नहीं किया जाएगा, तब तक अंकिता, निकिता, श्रद्धा और न जाने कौन कौन लाश बनती रहेंगी!

(यह स्टोरी हिंदू पोस्ट का है और यहाँ साभार पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है। )

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