10 नवंबर 1659: जब शिवाजी ने धोखेबाज अफजल को मृत्यु के घाट उतारा था

10 नवम्बर का दिन हिन्दुओं के लिए कभी न भूलने वाला दिन होना चाहिए क्योंकि वही दिन था जब वीर शिवाजी ने अफज़ल खान को मृत्यु के घाट उतारा था।

अफज़ल खान हर स्थिति में शिवाजी को मारना चाहता था, जबकि उसे यह पता था कि वह शायद ही शिवाजी को मार सके। उसे पहले ही उसकी मौत के बारे में बता दिया गया था। डेनिस किन्कैंड अपनी पुस्तक शिवाजी द ग्रांड रेबेल में लिखते हैं कि परंपरा के अनुसार जब अफजल खान अपनी विजय के लिए दुआ मांगने मस्जिद गया तो वहां पर मौलवी उसे देखते हुए रोने लगा।

और फिर उसने कहा कि उसने मौत के साए को अफजल पर देख लिया है। अफजल इसे अपनी मौत का संकेत मानकर अपने महल गया और अपने हरम में मौजूद 64 औरतों को पानी में डुबो कर मरवा दिया, जिससे वह उसकी मौत के बाद किसी और के साथ नया जीवन न जी सकें।

उसने सभी को आदेश दिया कि वह पानी में कूद जाएं और 64 में से 63 औरतें इस प्रकार कूद गयी थीं, जैसे वह कोई थी ही नहीं। वह ऐसे कूदती जा रही थीं, जैसे कि उनके कुछ आत्मा ही न हो। या तो वह यह सोच चुकी होंगी कि यही उनके जीवन का अंत है या फिर तलवार से कटने से बेहतर डूबना समझा होगा।

एक औरत ने डूबने से इंकार कर दिया था। यह इंकार अफजल को पसंद नहीं आया था। और आता भी क्यों? अफजल को यह पता था कि वह वापस नहीं आएगा तो फिर उसकी औरतें क्या करेंगी जीकर?

यह कितनी बड़ी विडंबना है कि इतिहास की इतनी बड़ी घटना पर कोई बात नहीं होती। कोई भी फेमिनिज्म डिस्कोर्स अर्थात फेमिनिज्म विमर्श नहीं पैदा होता, कि इतनी सारी महिलाओं को एक दिन में मार डाला गया और वह भी केवल इस कारण कि उनका “मालिक” मरने जा रहा था और वह जिंदा रहकर कहीं बढ़िया ज़िन्दगी न जी लें, तो उसने उन्हें मार डाला।

अफजल खान द्वारा की गयी यह हरकत इतिहास की सबसे शर्मनाक हरकतों में से एक है, परन्तु इस पर फेमिनिस्ट विमर्श नदारद है। कोई भी कथित फेमिनिस्ट इस पर बात नहीं करती है। हाँ, वह इस बात पर अवश्य चर्चा करती हैं कि कैसे हिन्दू राजा मुगलों से युद्ध हारते थे तो हिन्दू महिलाओं को जौहर करना होता था, अत: हिन्दू पुरुष अत्याचारी हैं, अपनी पत्नियों को मारने वाले हैं। परन्तु अफजल खान सहित मुगल बादशाहों द्वारा अपनी बेटियों के निकाह न किए जाने को लेकर वह चुप्पी साधती हैं और वह भी इतनी बड़ी चुप्पी कि बेशर्मी भी शर्मा जाए!

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कल्पना ही नहीं की जा सकती है कि कैसे एक आदेश पर कि कूदकर अपना जीवन समाप्त करो, 63 औरतें कूद गयी होंगी! वह अंतिम क्षण कैसे रहे होंगे और जिस एक औरत ने यह कहा कि वह नहीं कूदेगी तो उसे काट डाला गया। आज भी वह चौसंठ कब्रें उस ज़ुल्म की कहानी कहती हैं, जो उनके साथ हुआ था।

मगर अफजल ने पहले उन सभी को मारा और फिर शिवाजी से युद्ध करने के लिए निकला। उसे पता था कि वह वापस नहीं आने वाला है, इसलिए वह हर तरह से तैयारी करते हुए केवल शिवाजी को मारना ही चाहता था। वह मराठा साम्राज्य की ओर क्रूरता के साथ बढ़ता आ रहा था।

मार्ग में जो भी मंदिर पड़े थे, वह उन्हें तोड़ता हुआ आ रहा था। बीजापुर से चलता हुआ जब वह शिवाजी के राज्य की ओर आ रहा था तो वह मात्र यही चाहता था कि किसी भी प्रकार शिवाजी बाहर आ जाएं और वह आमने सामने के युद्ध में उन्हें परस्त कर दे। परन्तु शिवाजी जानते थे कि यह सब जाल है, वह अफजल के अपनी गुफा में आने की प्रतीक्षा में थे।

शिवाजी के पास यह सूचनाएं पहुँच रहीं थी, परन्तु उन्होंने धैर्य नहीं खोया और उन्होंने उसके आने की प्रतीक्षा की। शिवाजी के पास अफजल खान का संदेशा भी आया और उन्होंने सन्देश के उत्तर में यह सन्देश भिजवाया कि शिवाजी वही करेंगे जो अफजल चाहता है।

शिवाजी ने अफजल को सबक सिखाने की पूरी तैयारी कर रखी थी।

यह तय किया गया कि प्रतापगढ़ दुर्ग के नीचे जहां से रास्ता घने जंगलों की तरफ जाता है, वहां पर एक छोटी सी ऐसी झोपडी बनाई जाएगी, जहां पर प्रवेश का एक ही मार्ग हो! अफजल के आने के लिए बहुत ही खूबसूरत मार्ग की व्यवस्था की गयी। यह विशेष ध्यान रखा गया कि प्रतापगढ़ के दुर्ग में कोई भी कहीं से प्रवेश न करने पाए। इस योजना की एक एक गतिविधि की जानकारी मोरोपंत, नेताजी पालकर और तानाजी मालसुरे के पास थी। नेताजी पालकर दुर्ग के पूर्वी हिस्से की तरफ छिपे थे क्योंकि यह बहुत मुमकिन था कि अफजल की सेना वहां से आक्रमण करती। मोरोपंत खान की सेना के पीछे जावली गए। और आक्रमण के संकेत के लिए पांच तोपें लगाईं गईं!

अफजल खान पूरे 1500 सैनिकों के साथ आना चाहता था। परन्तु मुलाक़ात स्थल पर इतने लोग नहीं आ सकते थे इसलिए उसने अपने साथ सैनिकों की संख्या कम कर दी थी। उसे बताया गया कि शिवाजी इतने हथियारों और सैनिकों को देखकर भयभीत हो जाएंगे तो वह केवल एक तलवार लेकर आए। दोनों के बीच हुई शर्त के अनुसार दोनों ही अपनी अपनी तरफ के दो ही साथियों के साथ मिल सकते थे और शिवाजी को निशस्त्र मिलना था।

वह 10 नवंबर 1659 का दिन था जब दो योद्धा अपने अपने मन में शत्रु का खात्मा करने की योजना के साथ प्रतापगढ के पास मिल रहे थे। अफजल को अपने विशाल डीलडौल पर यकीन था और उसे लगता था कि वह शिवाजी को मसल देगा। अंतत: अफजल का इंतज़ार खत्म हुआ और शिवाजी के आने की उसे सूचना प्राप्त हुई। शिवाजी एक क्षण के लिए रुके, और उन्होंने दूर से ही अफजल को देखा! उसके विशाल शरीर को देखा! फिर धीरे धीरे कदम बढ़ाए। शर्त के अनुसार शिवाजी निशस्त्र थे, जैसे ही अफजल खान ने शिवाजी को देखा उसने उन्हें गले लगाने के बहाने अपने विशाल शरीर का फायदा उठाते हुए मारना चाहा। उसने अपनी बाजुओं से शिवाजी को कस कर लपेट लिया और गला दबाना चाहा परन्तु शिवाजी पूरी तरह से तैयार थे, और इससे पूर्व कि वह कुछ कर पाता वैसे ही शिवाजी ने सतर्कता बरतते हुए अफज़ल खान का पेट बाघनख (बाघ के नाखून से बना हथियार) से चीर दिया। अफजल की चालबाजियों के बारे में शिवाजी को पता था इसीलिए वह अपने अंगरखे में छुपाकर बाघनख लाए थे!

अफजल, मुझे ज्ञात था कि तुम कुछ न कुछ करोगे? तुमने यहाँ आने से तुलजापुर का मंदिर तोडा है, मेरे साथियों को मारा है और औरतों को छूने का दुस्साहस किया है! तुम्हें गाँवों में आग लगाई है! तुम्हारे पापों के लिए तो जितनी भी सजा दी जाए वह कम है! और जब यहाँ निशस्त्र आना था तब तुम तलवार लेकर आए! इतना विश्वासघात? मुझे अपनी बाजुओं में लपेट कर मारोगे? मगर समर्थ गुरु रामदास का यह शिष्य इतना निर्बल नहीं कि अपनी औरतों को मारने वाले के हाथों मारा जाए!” शिवाजी बघनखे से उसके पेट को चीरते हुए कहते जा रहे थे!

बड़ी बेगम के कहे अनुसार तुम दोस्ती के बहाने से मुझे मारना चाहते थे? मेरे संग उन्हीं विठोबा का आशीर्वाद है जिन्हें तुमने पंढरपुर में नष्ट करने का प्रयास किया, मगर वह सुरक्षित रहे! मेरे साथ माँ भवानी का आशीर्वाद है अफजल! तुमने हम मराठों को आपस में लड़ाने का प्रयास किया।” शिवाजी क्रोध में बोलते जा रहे थे! शिवाजी के इस रौद्र रूप में अफजल को वह सभी मूर्तियाँ याद आ रही थीं जिन्हें इतने वर्षों उसने तोडा था! उसे उन पुजारियों का दिया हुआ श्राप याद आ रहा था जो उन्होंने समवेत स्वरों में हर मूर्ति तोड़े जाने पर दिया था! यह रौद्र रूप उसे उन सब औरतों की चीखों की याद दिला रहा था, जिन्हें वह और उसके सैनिक दुश्मन राज्यों से उठा लाते थे और जिस्म से खेलने के बाद तलवार से टुकड़े कर देते थे!

अफजल को इस तरह देखकर उसके साथ आए अंगरक्षक ने शिवाजी पर तलवार से प्रहार किया। परंतु शिवाजी के साथ आए साथियों ने इसे विफल कर दिया। किसी नशेडी की तरह अफजल खान शिविर से बाहर भागा मगर शिवाजी ने जल्द ही उसका खात्माे कर दिया। मरते हुए अफजल के कानों में उस मौलवी की भविष्य वाणी गूंज रही थी। दो दिन पहले ही जिस औरत को मारा था उसके टुकड़े टुकड़े होते जिस्म ने उसे घेर लिया था और जिस्म का हर टुकड़ा चीख रहा था। उसकी चीख उसके कान में बार बार कंपित हो रही थी। जिन 63 बेगमों को बावडी में डुबोया था उनकी बाहें उसे बुला रही थीं। जिनकी बाहों में जाने के लिए वह उत्सुक रहता था आज उसे वह भयभीत कर रही थीं। आज तक जिन जिन राजाओं को उसने धोखे से मारा था वह सब उसके आसपास तलवार लेकर खडे थे और तुलजा पुर में उसके द्वारा ध्वस्त मां भवानी का मंदिर अट्टाहास कर रहा था। अफजल का सिर उसी तरह से काटा जा चुका था जैसे उस मौलवी ने बताया था। अफजल मारा जा चुका था और उसकी सेना एक ऐसे चक्रव्यू ह में फंसी थी जहां से जीवित नहीं निकला जा सकता था।

उसकी सेना शिवाजी के बिछाए हुए जाल में फंसी। वह वहीं की तरफ गयी जहां शिवाजी ले जाना चाहते थे। घोड़े, ऊँट और हाथी जंगल में वहीं पहुंचे जहां से वापसी का रास्ता न था और वापसी में शिवाजी की सेना ने मार्ग रोका हुआ था, हाथियों ने अपने ही घुड़सवारों एवं पैदल सैनिकों को कुचलना शुरू कर दिया!

अफजल की मौत की सूचना आसमान में कौंधती बिजली की तरह पूरे भारत में फ़ैल गयी! जिन सैनिकों ने समर्पण कर दिया, उनकी जान बख्श दी गयी। औरतों और बच्चों को सही सलामत उनके घर भेज दिया गया।

(महानायक शिवाजी उपन्यास से)

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(यह स्टोरी हिंदू पोस्ट का है और यहाँ साभार पुनर्प्रकाशित किया जा रहा है। )

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